Friday, April 22, 2011

मैं और बाबा जी

                    
               

   एक दिन मै और मेरे बाबा जी आम के बागीचे में बैठे हुए 
थे ,कुछ बातचीत के बाद मैंने उन्हें एक शायरी सुनाई-

मेरा  जमीर   तो  बेइमा   हो  जाता है
जब कोई   सामने   से गुजर जाता है !
अरे , बेइमा  तो  इसी उम्र में होंगे न
कुछ उम्र बाद तो बुढ़ापा आ जाता है !!

      
    इस शायरी को सुनने के बाद मेरे बाबा जी के चेहरे की जैसे 
रौनक ही चली गयी ;फिर मैंने बाबा जी को एक दूसरी शायरी सुनाई-
 
जवानी  में  क्या  नही होता है
जमीर  जमी  तले   होता   है !
कुछ उम्र और हो जाय तो क्या
इश्क  बुढ़ापे  में भी  होता है !!

 
          ये सुनने के बाद बाबा जी खिलखिला से उठे I तब मै समझा कि
बुड्ढे हैं पर दुपट्टों से प्यार , कुछ  जवाँ  जज्बात  तो हो ही जाते हैं II 

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